क्या है अमृत कुंभ, कुंभ की ज्योतिष गणना जानते है सुमित्रा से , क्या है महत्व...




क्या है अमृत कुंभ, कुंभ की ज्योतिष गणना जानते है सुमित्रा से , क्या है महत्व
डॉ सुमित्रा अग्रवाल
यूट्यूब वास्तु सुमित्रा
नया भारत डेस्क : पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में लगातार बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। ज्योतिष बताती है कि देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के बराबर होते हैं। इसी लिए कुंभ भी बारह ही होते हैं, परंतु उनमें से सिर्फ चार पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ देवलोक में होते हैं।
ऐसे होती है ज्योतिष गणना
कुंभ की गणना एक विशेष विधि से होती है जिसमें गुरू का अत्यंत महत्व है। नियमानुसार गुरू एक राशि लगभग एक वर्ष रहता है। यानि बारह राशियों में भ्रमण करने में उसे 12 वर्ष की अवधि लगती है। यही कारण है प्रत्येंक बारह साल बाद कुंभ उसी स्थान पर वापस आता है अर्थात प्रत्येेक बारह साल में कुंभ आयोजन स्थल दोहराया जाता है। इसी प्रकार गणना के अनुसार कुंभ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुंभ का अयोजन किया जाता है। कुंभ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग के कुंभ का विशेष महत्व होता है। हर 144 वर्ष बाद यहां महाकुंभ का आयोजन होता है क्योंकि देवताओं का बारहवां वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है।
राशि परिवर्तन से जुड़ा है कुंभ
पौराणिक विश्वास के साथ ही ज्योतिषियों के मतानुसार कुंभ का महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ भी जुड़ा है। ग्रहों की बदलती स्थिति ही कुंभ के आयोजन का आधार बनती है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी अर्ध कुंभ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।
आयोजन 12 वर्ष बाद क्यों
मान्यता है कि अमृत कलश की प्राप्ति के लिए देवताओं और राक्षसों में 12 दिन तक निरंतर युद्ध चला था। हिन्दू पंचांग के अनुसार देवताओं के 12 दिन अर्थात मनुष्य के 12 वर्ष माने गए हैं इसलिए कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है। अद्र्ध कुंभ मेला प्रत्येक 6 वर्ष में हरिद्वार तथा प्रयागराज में लगता है जबकि पूर्ण कुंभ बारह वर्ष बाद प्रयागराज में ही लगता है और बारह महाकुंभ मेलों के बाद 144 वर्ष बाद महाकुंभ मेला भी प्रयागराज में ही लगता है।
ऐसे तय होती है कुंभ मेला लगाने की तिथि
धर्म नगरी हरिद्वार में कुंभ का आयोजन पौराणिक ज्योतिष विश्वास और ज्योतिष गणना के अनुसार बृहस्पति के कुंभ और सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के कारण होता है। ये भी सनातन संस्कृति के वाहक हैं जो विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन और सनातन धर्म के सबसे बड़े पर्व कुंभ में आस्था का प्रतीक बनते हैं। सनातन हिंदू धर्म में कुंभ मेले का महत्व है। वेदज्ञों के अनुसार यही एकमात्र कुंभ मेला, त्यौहार व उत्सव है, जिसे सभी हिन्दुओं को मिल कर मनाना चाहिए।
धार्मिक सम्मेलनों की यह परंपरा भारत में वैदिक युग से चली आ रही है। जब ऋषि और मुनि किसी नदी के किनारे जमा होकर धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों पर विचार-विमर्श करते थे। यह परंपरा आज भी जारी है। कुंभ मेले के आयोजन के पीछे बहुत बड़ा विज्ञान है। जब-जब इस मेले के आयोजन का प्रारंभ होता है, सूर्य पर हो रहे विस्फोट बढ़ जाते हैं और इसका असर धरती पर बहुत भयानक रूप में होता है। देखा गया है कि प्रत्येक 11 से 12 वर्ष के बीच सूर्य पर परिवर्तन होते हैं।
कुंभ को विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन या मेला माना जाता है। इतनी बड़ी संख्या में आयोजन सिर्फ सनातन धर्म में ही होता है। कुंभ, जो प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होता है, एकत्रित लोगों को जोडऩे का एक माध्यम है। कुंभ का आयोजन प्रत्येक तीन वर्ष में चार अलग-अलग स्थानों पर भी होता है। अद्र्ध कुंभ मेला प्रत्येक 6 वर्ष में हरिद्वार और प्रयाग में लगता है जबकि पूर्ण कुंभ हर बारह साल बाद प्रयाग में ही लगता है। 12 कुंभ मेलों के बाद महाकुंभ मेला भी हर 144 साल बाद केवल प्रयागराज (इलाहाबाद) में ही लगता है।
माना जाता है कि समुद्र मंथन से जो अमृत कलश निकला था, उसमें से देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध के दौरान धरती पर अमृत छलक गया। जहां-जहां उसकी अमृत की बूंदें गिरीं वहां प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार कुंभ का आयोजन किया जाता है। इस कुंभ को पूर्ण कुंभ कहा जाता है।
कुंभ आयोजन के स्थान
हिन्दू धर्म के अनुसार इंद्र के बेटे जयंत के घड़े से अमृत की बूंदें चार जगहों पर गिरीं। हरिद्वार में गंगा नदी, उज्जैन में क्षिप्रा नदी, नासिक में गोदावरी और प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थान पर। धार्मिक मान्यता के अनुसार कुंभ में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वाले लोगों के सभी पाप कट जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। कुंभ मेला और ग्रहों का आपस में गहरा संबंध है। दरअसल, कुंभ मेला तभी आयोजित होता है जबकि ग्रहों की वैसी ही स्थिति निर्मित हो रही हो जैसे अमृत छलकने पर हुई थी।
मान्यता है कि बूंदें गिरने के दौरान अमृत और अमृत कलश की रक्षा करने में सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और शनि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चंद्र ने कलश की प्रश्रवण होने से, गुरु ने अपहरण होने और शनि ने देवेंद्र के भय से रक्षा की, सूर्य ने अमृत कलश को फूटने से बचाया। इसलिए पौराणिकों व ज्योतिषियों के अनुसार जिस वर्ष जिस राशि में सूर्य, चंद्र और बृहस्पति या शनि का संयोग होता है उसी वर्ष उसी राशि के योग में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरी थीं वहां कुंभ पर्व आयोजित होता है।
तिथियों से बढ़ गया महत्व
इस बार हरिद्वार में कुंभ का आयोजन उस समय हो रहा है जबकि मकर संक्रांति का योग भी बन गया है साथ ही दूसरे दिन सूर्य ग्रहण है। इसके अलावा भी कई और महत्वपूर्ण दिनों में स्नान करने की तिथि है। इस सदी के कारण इस बार का कुंभ स्नान महाफल देने वाला माना जा रहा है।
दूनिया भर में सनातन धर्म का सबसे प्रसिद्ध महापर्व और धार्मिक मेला कुंभ तो हम सभी जानते हैं। लेकिन इसे लेकर मन में तमाम तरह की जिज्ञासाएं भी होती हैं। कभी इसकी शुरुआत कैसे हुई तो कभी इसके साथ जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को जानने की जिज्ञासा होती है।
कुंभ, अर्धकुंभ,पूर्णकुंभ और महाकुंभ एक नजर में
प्रत्येक 3 साल में हरिद्वार, उज्जैन, प्रयागराज और नासिक में एक बार आयोजित होने वाले मेले को कुंभ के नाम से जानते हैं। वहीं हरिद्वार और प्रयागराज में प्रत्येक 6 वर्ष में आयोजित होने वाले कुंभ को अर्धकुंभ कहते हैं। वहीं केवल प्रयागराज में प्रत्येक 12 साल में आयोजित होने वाले कुंभ को पूर्ण कुंभ मेला कहते हैं। इसके अलावा केवल प्रयागराज में 144 वर्ष के अंतर पर आयोजित होने वाले कुंभ को महाकुंभ मेला कहते हैं।
इस तरह समझिए कुंभ के आयोजन की प्रक्रिया
प्रत्येक 12 वर्ष में पूर्णकुंभ का आयोजन होता है। मान लीजिए कि उज्जैन में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद प्रयागराज और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा। उसके तीन वर्ष बाद फिर से उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा। इसी तरह जब हरिद्वार, नासिक या प्रयागराज में 12 वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होगा तो उसे पूर्णकुंभ कहेंगे। हिंदू पंचांग के अनुसार देवताओं के बारह दिन अर्थात मनुष्यों के बारह वर्ष माने गए हैं इसीलिए पूर्णकुंभ का आयोजन भी प्रत्येक बारह वर्ष में ही होता है।
महाकुंभ को ऐसे जानिए विस्तार
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक 144 वर्षों में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन होता है। 144 कैसे? 12 का गुणा 12 में करें तो 144 आता है। दरअसल, कुंभ भी बारह होते हैं जिनमें से चार का आयोजन धरती पर होता है शेष आठ का देवलोक में होता है। इसलिए प्रत्येक 144 वर्ष बाद प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन होता है। महाकुंभ का महत्व अन्य कुंभों की अपेक्षा अधिक माना गया है। वर्ष 2013 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन हुआ था क्योंकि उस वर्ष पूरे 144 वर्ष पूर्ण हुए थे। कहा जा रहा है कि अब अगला महाकुंभ 138 वर्ष बाद आएगा।
ग्रहों के गोचर और स्थान से ऐसे जुड़ा है कुंभ
कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। वहीं मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चंद्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।
तब होता है नासिक और उज्जैन में
सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुम्भ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चंद्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है। वहीं सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्ष दायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।
कुंभ, अर्ध कुंभ और सिंहस्थ में क्या है अंतर ?
बारहा वर्ष में चार स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता है। कुम्भ,अर्ध कुम्भ और सिंहस्थ क्या का हिंदू धर्म में बहुत महत्व होता है। उज्जैन, हरिद्वार, प्रयागराज, फिर नासिक में कुंभ मेले का आयोजन होता है। जिसमे उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है। नक्षत्रों, ग्रहों और राशियों के संयोग से इस कुम्भ यात्रा का योग 6 और 12 वर्षो में इन स्थानों पर बनता है। अर्ध कुम्भ का पर्व केवल, प्रयाग और हरिद्वार में ही मनाया जाता है। ग्रह और राशियों के संगम के अनुसार इन स्थानों पर स्नान करना मोक्ष दायी माना जाता है। नक्षत्रों, ग्रहों और राशियों के संयोग से इस कुम्भ यात्रा का योग 6 और 12 वर्षो में इन स्थानों पर बनता है। ग्रह और राशियों के संगम के अनुसार भी इन स्थानों पर स्नान करना मोक्ष दायी माना जाता है। आइए जानते है कि कुंभ, अर्ध कुम्भ और सिंहस्थ क्या है? कुंभ क्या है? कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के समय अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा। अर्ध कुंभ क्या है? अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग इन दोनों स्थानों पर छह-छह वर्षों में दो कुंभ पर्वों के अंतराल में अर्ध कुंभ का आयोजन किया जाता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण दिया गया है। कुंभ पर्व हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में तीन वर्षों का अंतर होता है। सिंहस्थ क्या है? सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से होता है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ मैले का आयोजन होता है। इसके साथ सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ कहा जाता हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है।
प्रयागराज में 6 जनवरी 2023 से माघ पूर्णिमा के स्नान इस मेले की शुरुआत ही चुकी है। बता दें, मेले का आखिरी दिन 18 फरवरी 2023 यानी महाशिवरात्रि के दिन होगा। माघ मेले में गंगा-यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर डेढ़ महीने तक साधुओं से लेकर भक्तों तक डुबकी लगाने के लिए आते हैं। प्रयागराज में होने वाले माघ मेले को अर्ध कुम्भ मेला भी कहा जाता है। इसमें कल्पवासी 45 दिन तक संगम के किनारे रहते हैं। ऐसा माना जाता है जो इस खास तिथि पर स्नान करने के लिए आता है उसके पाप सारे मुक्त हो जाते हैं।
माघ मेला का अगला स्नान -
माघ मेला 2023 का पहला स्नान 6 जनवरी, पौष मास की पूर्णिमा से शुरू किया गया था। माघ मेले का पहला स्नान पौष पूर्णिमा के दिन 6 जनवरी को किया गया था। इसके बाद दूसरा स्नान मकर संक्रांति फेस्टिवल पर 14 से 15 जनवरी को किया जाएगा। 18 फरवरी को महाशिवरात्रि पर मेले के आखिरी दिन के बाद मौनी अमावस्या का स्नान 21 फरवरी 2023 को होगा। अगर आप माघ मेला में स्नान के लिए जाना जाता है, तो इन दिनों में अपनी प्लानिंग कर सकते हैं।
क्या है माघ मेला में कल्पवास का अर्थ -
माघ मेला में हिंदू धार्मिक त्योहार है। ये भगवान ब्रह्मा द्वारा ब्रह्मांड का निर्माण करने पर उसका जश्न मनाने के लिए इसका आयोजन किया जाता है। माना जाता है जो लोग इस दौरान कल्पवास का पालन करते हैं, उनके पिछले जन्म में भी किए सारे पाप धुल जाते हैं। उन्हें जन्म-मृत्यु के चक्र से भी मुक्ति मिल जाती है। बता दें, कल्पवास करने वालों को कल्पवासी कहा जाता है।
नागा साधुओं की देखने को मिलती है भीड़ -
डेढ़ महीने तक चलने वाले माघ मेले में नागा साधु भी देखने को मिलेंगे। जो साधु सालों-सालों तक कहीं भी नजर नहीं आते, वो भी इन दिनों में संगम पर स्नान करने के लिए आते हैं। बता दें, नागा साधु काफी रहस्यों से भरे होते हैं, वो ज्यादा किसी से घुलते नहीं हैं, पूरे साल नग्न अवस्था में हिमालय पर वास करते हैं।
यात्रियों के लिए किए गए इंतजाम -
यात्रियों के लिए माघ मेला में स्नान के लिए हर तरह के इंतजाम किए गए हैं। हर होटल या आश्रम में 2500 लोगों रुकने की व्यवस्था की गई है। प्रयागराज जंक्शन पर करीबन 10 हजार यात्री रुक सकते हैं। सीएक साथ ही आश्रयों में पूछताछ के लिए काउंटर, टिकट काउंटर, ट्रेन टाइमिंग डिस्प्ले बोर्ड, पीने का पानी, लाइट और टॉयलेट की व्यवस्था भी की गई है।
प्रयागराज कैसे पहुंचे -
हवाई मार्ग से प्रयागराज कैसे पहुंचे : प्रयागराज का अपना हवाई अड्डा है। यह मुख्य शहर से केवल 12 किमी दूर है। आसपास के दूसरे हवाई अड्डे वाराणसी, लखनऊ और कानपुर में हैं। आप आसानी से प्रयागराज के लिए उड़ानें बुक कर सकते हैं।
रेल द्वारा प्रयागराज कैसे पहुंचे : प्रयागराज जंक्शन उत्तरी भारत के प्रमुख जंक्शनों में से एक है और कई ट्रेनें हैं जो इसे दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, भोपाल, कोलकाता और जयपुर जैसे कई अन्य स्थानों से जोड़ती हैं। शहर के चार महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन रामबाग में सिटी स्टेशन, दारागंज स्टेशन, प्रयाग स्टेशन और इलाहाबाद स्टेशन हैं।
सड़क मार्ग से प्रयागराज कैसे पहुंचे : प्रयागराज कानपुर से 207 किमी, लखनऊ से 238 किमी, नई दिल्ली से 633 किमी, भोपाल से 677 किमी और जयपुर से 686 किमी दूर है। यहां तक आप उत्तर प्रदेश परिवहन की मदद से भी आसानी से पहुंच सकते हैं।
1. माघ मेला पार्किंग की व्यवस्था?
शहरों से आने वाले दो पहिया और चार पहिया वाहनों को पार्किंग की व्यवस्था दी जाएगी।
2. माघ मेला में हेल्प डेस्क?
माघ मेला में लोगों की सुविधा के लिए 6 हेल्प डेस्क बनाए गए हैं, परेशानी होने पर आप यहां सम्पर्क कर सकते हैं।
3. मेले में ठहरने का इंतजाम?
मेले में 500 बेड की डॉरमेट्री तैयार की गई है। इसमें कोई भी यात्री ठहर सकता है। इसके लिए आपको पैसे देने होंगे।