शिव विवाह से जुडी ९ महत्वपूर्ण बातें - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...

शिव विवाह से जुडी ९ महत्वपूर्ण बातें - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...
शिव विवाह से जुडी ९ महत्वपूर्ण बातें - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...

शिव विवाह से जुडी ९ महत्वपूर्ण बातें - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से 

डॉ सुमित्रा अग्रवाल 
वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा अग्रवाल 
कोलकाता 
यूट्यूब वास्तु सुमित्रा 

कोलकाता : भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह का दृश्य भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण घटना है। यह विवाह केवल एक आध्यात्मिक घटना नहीं था, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन और सृष्टि के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था। विवाह का हर पहलू प्रतीकात्मक था, जो गहरे आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेशों को दर्शाता है।

यहाँ शिव-पार्वती विवाह के विभिन्न पहलुओं का महत्त्व बताया गया है :

1. शिव-पार्वती की प्रेमकथा :

विवाह से पहले पार्वती  ने कठोर तपस्या की थी ताकि वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त कर सकें। यह तपस्या स्त्री की भक्ति, समर्पण, और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है। इसके माध्यम से यह बताया जाता है कि सच्चे प्रेम और समर्पण से इच्छाओं की पूर्ति हो सकती है, चाहे वह कितनी भी कठिन क्यों न हो।

2. शिवजी का वैरागी रूप :

भगवान शिव का विवाह एक ऐसी घटना थी जिसमें उन्होंने अपने संन्यासी जीवन को त्याग कर पारिवारिक जीवन को अपनाया। यह यह दर्शाता है कि संसारिक जीवन को अपनाना और उसे सही दिशा में चलाना भी एक आवश्यक आध्यात्मिक कार्य है। शिवजी का विवाह यह भी प्रतीक है कि आध्यात्मिकता और संसारिकता का संतुलन आवश्यक है।

3. विवाह स्थल और आयोजन :

भगवान शिव और पार्वती का विवाह हिमालय पर हुआ था, जो शक्ति और स्थिरता का प्रतीक है। यह विवाह राजा हिमवान और रानी मैना द्वारा आयोजित किया गया था, जो देवी पार्वती के माता-पिता थे। यह पर्वतों की स्थिरता और शक्ति को भी दर्शाता है, जो एक मजबूत परिवार और समाज की नींव होते हैं।

4. बारात और विभिन्न देवता :

शिव की बारात में विभिन्न असाधारण प्राणी जैसे भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व, और अन्य देवता शामिल हुए थे। यह इस बात का प्रतीक है कि शिवजी हर रूप और हर वर्ग के लोगों को स्वीकार करते हैं। यह भी यह सिखाता है कि प्रेम और विवाह में सामाजिक स्थिति या भौतिक पहलुओं का कोई महत्त्व नहीं होता है।

5. गौरी पूजा और कन्यादान :

विवाह से पहले पार्वती जी ने माँ गौरी की पूजा की थी, जो स्त्री के भीतर की शक्ति और पवित्रता का प्रतीक है। इसके बाद कन्यादान किया गया, जो विवाह संस्कार में पवित्र मानी जाती है। इसमें पिता अपनी बेटी को वर के हाथों में सौंपते हैं, जो एक उच्च कोटि का त्याग और विश्वास का प्रतीक है।

6. मंगलसूत्र और सप्तपदी :

शिव-पार्वती के विवाह में मंगलसूत्र का बंधन और सप्तपदी (सात फेरे) का भी महत्त्व है। यह बंधन जीवन के सात महत्वपूर्ण पहलुओं का प्रतीक है—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, संतान, स्वास्थ्य, और प्रेम। सप्तपदी विवाह में एक गहरे बंधन और जीवनभर की जिम्मेदारी का प्रतीक है।

7. सृष्टि का संतुलन :

शिव और पार्वती का विवाह ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक है। शिवजी को "पुरुष" और पार्वती को "प्रकृति" के रूप में देखा जाता है, और इन दोनों का एक होना सृष्टि की शुरुआत और निरंतरता के लिए आवश्यक माना गया है। यह दर्शाता है कि सृष्टि में स्त्री और पुरुष की समान भूमिका होती है।

8. अर्धनारीश्वर स्वरूप :

विवाह के बाद भगवान शिव और देवी पार्वती को "अर्धनारीश्वर" के रूप में दिखाया जाता है, जहाँ शिवजी का आधा शरीर पुरुष और आधा शरीर स्त्री का होता है। यह रूप संतुलन, समन्वय और स्त्री-पुरुष दोनों के सामंजस्य का प्रतीक है। यह बताता है कि जीवन में कोई भी शक्ति अकेले पूर्ण नहीं होती, और स्त्री और पुरुष की शक्तियाँ एक साथ मिलकर जीवन को पूर्ण बनाती हैं।

9. पारिवारिक जीवन का आदर्श :

शिव और पार्वती का विवाह और उनका परिवार (गणेश और कार्तिकेय के साथ) एक आदर्श पारिवारिक जीवन का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि पारिवारिक रिश्तों में प्रेम, सम्मान, और सहयोग होना जरूरी है।