"ॐ" के उच्चारण का महत्व - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...




"ॐ" के उच्चारण का महत्व - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से
डॉ सुमित्रा अग्रवाल
वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा अग्रवाल
कोलकाता
कोलकाता : "ॐ" का उच्चारण प्राचीन वैदिक परंपरा में अत्यधिक महत्व रखता है, और इसे केवल एक शब्द से अधिक माना जाता है—यह ब्रह्मांडीय ध्वनि या ऊर्जा का प्रतीक है। इसके तीन भाग ' अ ', ' उ ', और ' म ' सृष्टि के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और इनका उच्चारण सही ढंग से करने से गहरे आध्यात्मिक और मानसिक लाभ मिलते हैं।
1. प्रत्येक ध्वनि का महत्त्व :
(अ): यह जागृति (सृष्टि) का प्रतिनिधित्व करता है। इस ध्वनि के साथ हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़ते हैं।
(उ): यह जीवन के विस्तार और संरक्षण का प्रतीक है। यह ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है।
(म): यह मौन और समाप्ति (विनाश) का प्रतीक है, जो जीवन के समापन के बाद नए आरंभ की ओर संकेत करता है।
2. पूरी ध्वनि का प्रभाव :
"ॐ" का लगातार और सही उच्चारण करने से शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक स्तर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसे साधारण ध्वनि के बजाय एक गहरी कंपन के रूप में माना जाता है, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों पर प्रभाव डालती है:
'अ' ध्वनि पेट में कंपन उत्पन्न करती है, जो पाचन और सृजनात्मक ऊर्जा को जागृत करती है।
'उ' का कंपन छाती और दिल के क्षेत्र को प्रभावित करता है, जो प्रेम और सुरक्षा की भावना को बढ़ावा देता है।
'म' मस्तिष्क में कंपन करता है और इसे मानसिक शांति और ध्यान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
3. आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व :
योग और ध्यान की परंपराओं में "ॐ" का उच्चारण मानसिक शांति और ध्यान केंद्रित करने का एक तरीका है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी, इसके कंपन मस्तिष्क में अल्फा तरंगों को सक्रिय करते हैं, जो शांत और ध्यानपूर्ण स्थिति से जुड़े होते हैं। अध्यात्म में, इसे "ब्रह्मांडीय कंपन" माना जाता है, जो व्यक्ति को ब्रह्मांड से जोड़ता है।
4. अ ', ' उ ', और ' म ' के बराबर उच्चारण का महत्त्व :
अ ', ' उ ', और ' म ' को बराबर और संतुलित रूप में उच्चारित करना आवश्यक है, क्योंकि यह सृष्टि, पालन, और विनाश के संतुलन को दर्शाता है। यदि इन तीन ध्वनियों में से किसी एक को सही तरीके से उच्चारित नहीं किया जाए, तो इसका पूरा प्रभाव नहीं मिल पाता।