ईश्वर के उपर आस्था कब कम होती हैं इंसान की, जब इंसान ईश्वर को साक्षी मानकर अपने कर्म करते हैं, और उस सत्य कर्म में शुभ की जगह अशुभ फल की प्राप्ति होती है।
When the faith in God decreases,




NBL, 22/10/2022, Lokeshwer Prasad Verma, Raipur CG: When the faith in God decreases, when human beings do their deeds considering God as a witness, and in that true action, instead of good, inauspicious results are obtained.
विश्व के जो भी इंसान इस धरती पर मौजूद हैं, वह इंसान कोई न कोई धर्म से जुड़े हुए है, और उस धर्म के प्रति उनकी अपनी आस्था व सम्मान है, जो हमारे धर्म के ईष्ट है, उनके भरोसे पर हम इंसान टिके हुए है, और जो भी शुभ कार्य करते हैं, तो हम इंसान उस ईश्वर को हाजिर नाजिर मानकर उनके आशीर्वाद प्राप्त का शुभ फल चाहते हैं, हे भगवान हमारे इस शुभ कार्य में कोई विघ्न ना आए हे ईश्वर आपके वरद हस्त हम पर बना रहे, इसी आस्था के साथ हम अपने धर्म के उपर आस्था विश्वास रखते हैं, यही क्रम हम इंसानो के जीवन में चलते रहते हैं।
हम इंसानो को कोई ना कोई धोखा मिलता है, और वह धोखा ईश्वर से नहीं बल्कि हम इंसानो से ही मिलता है, और उसी धोखे का नुकसान को ईश्वर के उपर हम इंसान थोप देते हैं, हे भगवान मेरे साथ आपने क्या किया मै तो आपके उपर भरोसे करते हुए, इस कर्म को किया, और जिस कर्म को मै कर रहा था, उस कर्म का फल जन हित कार्यो के लिए कर रहा था, लेकिन आप उस शुभ कर्म मे बााधा क्यो पहुँचाई जबकि उस शुभ कर्म को करने से पहले आपको याद किया था, इन्ही सब कारणों से हम इंसान अपने धर्म ईश्वर के आस्था से भटक जाते है और हम अपने उस धर्म के ईश्वर को हम अपने निजी स्वार्थ के आपूर्ति का जिम्मेदार मानते है, जबकि उस नुकसान का जिम्मेदार हम स्वयं इंसान है, जो इंसान अपने गंदे नियत से औरो का नुकसान किया बल्कि वह गंदे नियत वाले इंसान ना खुद उनका अपना भला कीया ना ही औरो का भला कर पाए। इन्ही सब कारणों से हम इंसानो में कमी आती है, अपने उस धर्म के आस्था से जबकि ऐसा निम्न सोच रखना हम इंसानो के प्रगति के लिए सबसे बड़ा बााधक है। जबकि हम अपने ईश्वर के आस्था मे अटल रहे, ताकि भगवान उन गंदे नियत रखने वाले लोगों से आपको बचा सके, या बचाया करके अपने ईश्वर को बार बार शुक्रिया अदा करे।
हम इंसान अपने दैनिक जीवन में बहुत ही उतार चढ़ाव देखते है, और इन्ही सबसे हम सीखते हैं, अच्छे या बुरे का ज्ञान होता है, और अपने भाग्य का निर्माता आप स्वयं से बनते हैं, क्योकि आपको आपके ही जीवन सब कुछ सिखा देती है, इन्ही जीवन से लिए हुए सार्थक ज्ञान व कर्म आपको प्रखर बनाती है, सोचने समझने की शक्ति देती है, सब कुछ आप जानते है, उसके बावजूद आप अपने जीवन मे बार बार गलती करते हैं, तो उसमे ईश्वर का क्या गलती ये तो आपके द्वारा निर्माण किया गया गलती है, जो अपनी भौतिक जीवन की जरूरतों को पूरे करने के लिए बनाया।