नारद मुनि इतने बड़े ऋषि होने के बाद भी क्यों  व्यंग्य का विषय बनते रहे - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...

नारद मुनि इतने बड़े ऋषि होने के बाद भी क्यों  व्यंग्य का विषय बनते रहे - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...
नारद मुनि इतने बड़े ऋषि होने के बाद भी क्यों  व्यंग्य का विषय बनते रहे - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से...

नारद मुनि इतने बड़े ऋषि होने के बाद भी क्यों  व्यंग्य का विषय बनते रहे - जानते है वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से 

डॉ सुमित्रा अग्रवाल 
वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा अग्रवाल 
कोलकाता 
यूट्यूब वास्तु सुमित्रा 

कोलकाता : नारद मुनि को हिंदू धर्म में एक दिव्य ऋषि और भगवान विष्णु के परम भक्त के रूप में जाना जाता है। हालांकि, उन्हें अक्सर "इधर-उधर बातें करने" और "चुगली करने" वाला माना जाता है, जो हास्य और व्यंग्य का विषय भी बनता है। इसका एक सांस्कृतिक और धार्मिक पहलू है, जिसे समझने के लिए हमें नारद मुनि के चरित्र और उनके कार्यों के पीछे के गहरे अर्थ को समझना होगा।

नारद मुनि का चरित्र :

भगवान विष्णु के परम भक्त: नारद मुनि भगवान विष्णु के प्रमुख भक्तों में से एक हैं और उनके संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं। वे ब्रह्मांड में यात्रा करते हैं और विभिन्न देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों के बीच संवाद स्थापित करते हैं।

त्रिलोक संचारक: नारद मुनि त्रिलोक—स्वर्ग, धरती और पाताल—में स्वतंत्र रूप से यात्रा करते हैं और उनकी उपस्थिति अक्सर घटनाओं को दिशा देती है।

ज्ञान और सत्य का प्रचार :

नारद मुनि का प्रमुख उद्देश्य धर्म का प्रचार और जीवों का कल्याण करना है। उनके द्वारा कही गई बातें अक्सर किसी व्यक्ति या घटना को सही दिशा में मोड़ने के लिए होती हैं।

नारद मुनि पर "चुगली" का आरोप :

लोककथाओं और पुराणों में नारद मुनि के कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहां उन्हें ऐसा लगता है कि वे "इधर-उधर" की बातें करके समस्याएं पैदा कर रहे हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरा और सकारात्मक उद्देश्य होता है।

कुछ प्रमुख घटनाएँ :

देवताओं और असुरों के बीच संवाद :

नारद मुनि कभी-कभी देवताओं और असुरों के बीच संवाद स्थापित करते हैं, जो कभी-कभी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर देता है। लेकिन इसका उद्देश्य हमेशा अंततः धर्म की स्थापना और सत्य की विजय होता है।

विवाह प्रस्तावों में हस्तक्षेप :

नारद मुनि ने कई अवसरों पर विवाह प्रस्तावों में हस्तक्षेप किया है, जैसे रामायण में सीता स्वयंवर के समय। उन्होंने रावण को सीता के स्वयंवर में शामिल होने की सलाह दी थी, जो अंततः रावण के विनाश का कारण बना। इसे लोग "चुगली" के रूप में देख सकते हैं, लेकिन इससे धर्म की स्थापना हुई।

प्रहलाद और हिरण्यकश्यप :

नारद मुनि ने हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को विष्णु भक्ति की शिक्षा दी थी, जिससे प्रहलाद महान भक्त बने और अंततः हिरण्यकश्यप का विनाश हुआ। इसे भी कुछ लोग "चुगली" मान सकते हैं, लेकिन यह धर्म और सत्य के मार्ग पर प्रहलाद को स्थापित करने के लिए था।

नारद मुनि का "चुगली" करने का सास्कृतिक और धार्मिक पक्ष:
लीला का हिस्सा: नारद मुनि के कार्यों को अक्सर भगवान की लीला के रूप में देखा जाता है। वे जिन घटनाओं का सूत्रधार बनते हैं, उनका उद्देश्य एक बड़े धार्मिक या दैवीय उद्देश्य की पूर्ति होता है। उनकी बातें या घटनाएं, जो कभी-कभी समस्याएं उत्पन्न करती हैं, अंततः धर्म की स्थापना और सत्य की जीत के लिए होती हैं।

धर्म का प्रचारक :

नारद मुनि का उद्देश्य हमेशा धर्म का प्रचार करना होता है। उनकी बातें या "इधर-उधर की चर्चा" हमेशा किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती हैं, चाहे वह भगवान की योजना को पूरा करना हो या जीवों के कल्याण के लिए मार्ग प्रशस्त करना हो।

मानव स्वभाव का परीक्षण :

नारद मुनि अक्सर लोगों के स्वभाव और चरित्र की परीक्षा लेते हैं। उनके सवाल या बातें लोगों को उनकी कमजोरियों का एहसास कराती हैं और उनके सुधार का मार्ग प्रशस्त करती हैं। उदाहरण के लिए, जब वे किसी राजा या देवता के साथ संवाद करते हैं, तो वे उन्हें उनकी भौतिक इच्छाओं से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करते हैं।

"चुगली" और धर्म में अंतर :

चुगली आमतौर पर नकारात्मक रूप में प्रयोग होता है, जिसका उद्देश्य किसी के बीच गलतफहमी पैदा करना होता है।

लेकिन नारद मुनि का "चुगली" करना दरअसल धर्म की स्थापना और सत्य की विजय के लिए होता है। उनकी बातें घटनाओं को मोड़ देती हैं, ताकि अंततः धर्म का मार्ग प्रशस्त हो।

नारद मुनि के कार्यों का उद्देश्य :

अंततः धर्म की स्थापना: नारद मुनि के कार्यों का अंतिम उद्देश्य धर्म की रक्षा और सत्य का प्रचार करना है।

परिणाम में अच्छाई: चाहे उनके कार्य प्रारंभ में नकारात्मक प्रतीत हों, अंततः उनके परिणाम सकारात्मक होते हैं और अच्छाई की स्थापना होती है।