सन्त के रोम-रोम में, उनकी ही देह में प्रभु रमते हैं...

सन्त के रोम-रोम में, उनकी ही देह में प्रभु रमते हैं...
सन्त के रोम-रोम में, उनकी ही देह में प्रभु रमते हैं...

इस दुनिया से जाते समय सन्त अपना चार्ज, अपने जीवों की जिम्मेदारी अपने उत्तराधिकारी को देकर जाते हैं, जीव को छोड़ते नहीं हैं

​​​​सन्त के रोम-रोम में, उनकी ही देह में प्रभु रमते हैं

सीकर (राजस्थान) : निजधामवासी बाबा जयगुरुदेव  के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी, इस समय के युगपुरुष, पूरे समरथ सन्त सतगुरु, दुःखहर्ता, उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त  महाराज ने 4 अक्टूबर 2020 सांय उज्जैन आश्रम में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि गुरु महाराज ने बहुतों का सब कुछ किया और जो जिसके लायक था, जिसके अंदर जैसी भाव भक्ति, श्रद्धा, प्रेम, लगन और मेहनत था, उसी हिसाब से उन्होंने किया और फल दिया। लेकिन यह भी इतिहास बता रहा है कि सन्त जिनको पकडते हैं, उसको छोड़ते नहीं है चाहे कितना भी समय लग जाए। सन्त क्या करते हैं? जाने के बाद भी जीव को (अपने उत्तराधिकारी को) सौंप के जाते हैं। कहा गया है- चौथ (जन्म) में निज धाम। यह नियम बनाया गया। चाहे चार जन्म लगे लेकिन सन्त पार करते ही करते हैं। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, फिर चौथे को चार्ज, ऐसे देते चले जाते हैं। अब अगर जीव चेत गया, जान गया, भजन कर लिया, कर्मों को काट लिया तो उसकी जीवात्मा का उद्धार हो गया तो हो गया, नहीं तो दूसरा जन्म लेना पड़ता है। फिर उस वक्त के जो सन्त होते हैं, जिसको वह (गुरु अपना) अधिकार पावर देकर के जाते हैं, उसके सुपूर्द कर देते हैं। वह रगड़ाई करता है, वो कराता है, नाम दान देता है मतलब सन्त अपने जीव को छोड़ते नहीं है।

सन्तों को शरीर छोड़ने पर तकलीफ नहीं होती है

महाराज  ने 5 अगस्त 2020 सांय उज्जैन आश्रम में बताया कि अंत समय में जब जीवात्मा को वापस इस शरीर में नहीं आना होता है, जब प्राण निकलते हैं तब  तकलीफ कुछ न कुछ सबको होती है जैसे अच्छी साधना करने वाले साधकों को चाहे एक-दो बार हिचकी आवे लेकिन सन्तों के लिए यह लागू नहीं होता है। क्योंकि सन्त की जब इच्छा होती है तब शरीर को छोड़ देते हैं। पहले से ही साधना करके अपने शरीर से मोह खत्म कर देते हैं। तो जब जीवात्मा का इससे मोह नहीं रह जाता है तब प्राण को आराम से निकाल देते हैं। जीवात्मा को निकाल दिया, खींच दिया तो प्राण नीचे से खिंच जाते हैं। जैसे साधना में प्राणों को नीचे से खींचा जाता है, ऐसे नीचे से खींच देते हैं। पापी कुकर्मी को तो हड्डी-हड्डी का दर्द सहन करना पड़ता है। जैसे हड्डी में कोई मार मारे तो बहुत तेज दर्द बराबर करता है। मांस पर पड़ता है तो उतना तेज दर्द नहीं करता है, हिले डुलेगा तब, दबाओगे तब दर्द करेगा। तो पापियों की हड्डी-हड्डी उस समय पर चटकती है क्योंकि खिंचाव होता है। यह सत्य है कि जाते समय सबको तकलीफ होती है। अब यह जरूर है कि जैसे कोई पानी में गिर गया तो कोई डूब गया तो डूबा तो नीचे चला गया और सांस फूला तो प्राण निकल गए या प्राणों को अपने निकाल लिया। और कुछ ऐसे होते हैं कि नीचे डूबते हैं और फिर उसके बाद फिर ऊपर आ जाते हैं फिर उसके बाद तड़पते हैं। पेट शरीर भारी हो जाता है, मुंह में पानी चला जाता है फिर नीचे ले जाता है तो डूबते हैं। तो डूबो और उतराओ। इस दुनिया को भवसागर बताया गया। तो इसमें डूबना और मरना पड़ता है। जैसे मर गए, फिर जन्म लिया, फिर पुनर्जन्म हुआ, फिर आए और गए इसलिए भवसागर बताया गया। जैसे इंसान भवसागर में डूबता है, इसी तरह से जल में भी डूबने से कष्ट होता है लेकिन कष्ट सबको होता है। कहते हैं भगवान राम गुप्त हुए थे तो पानी के अंदर गए थे। अब जो सिद्धांत उसूल नियम है उस नियम के अंतर्गत तो सबको कष्ट तकलीफ होती है। इसी तरह से कृष्ण भगवान को बहेलिया ने जब बाण मारा था तब कृष्ण भगवान को भी तकलीफ हुई थी।

सन्त के रोम रोम में प्रभु रमते हैं

महाराज  ने 15 जुलाई 2023 प्रातः उज्जैन मध्य प्रदेश में बताया कि प्रभु की व्याख्या में प्रभु ने समझो यह कहा है कि सन्त हमारी आत्मा और सन्तन की ही देह। सन्त की आत्मा उतनी ही पावरफुल ताकत वाली है। मेरी ही ताकत उनमें है। जो सन्तों का देह समझो मेरा ही देह है। सो जानत ते देव जनाहि। जो जानने की कोशिश करता है, उन्ही जैसा हो जाता है। और रोम-रोम में रम रहा। उनके रोम-रोम में प्रभु रमते रहते हैं। जैसे बादल में पानी। ऐसे ही रोम-रोम में रम रहा, इस तरह से (सन्त के) रोम-रोम में मैं रमता रहता हूं। कहने का मतलब यह है जब ऐसे सन्त सतगुरु मिलते हैं तब अंतर में बोध ज्ञान होता है, नहीं तो तब तक लोग भटकते रहते हैं।

सन्त सपूत होते हैं

महाराज  ने 16 अगस्त 2021 सांय सीकर (राजस्थान) में बताया कि सन्तों का बड़ा विरोध हुआ लेकिन सन्तों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। और पुराने रास्ते को छोड़कर नया रास्ता अपना लिया। पुराने रास्ते में जो बधायें थी, वह बाधायें वहीं की वहीं रह गई। कहा गया है- लीक-लीक कायर चलें, लीके चले कपूत, लीक छाड़ तीनों चले, शायर सिंह सपूत। सन्त सपूत होते हैं। गुरु महाराज जैसे सन्त थे, सपूत थे। सपूत जो होते हैं उसे चाहे बाप का कुछ न मिले, चाहे पैतृक संपत्ति न हो वह खुद संपत्ति बना लेते हैं, खुद प्रतिष्ठा बढ़ा लेते हैं, बाप का नाम पीछे हो जाता है। लोग लड़के को बाप के लिए कहते हैं जैसे यह जज साहब के, कलेक्टर साहब के पिताजी हैं। यह नहीं कहना पड़ता है की यह मास्टर साहब का लड़का है। यानी वह अपना रास्ता खुद बना लेते हैं।