ऐसा दीप जलाओ, जो कभी बुझे ही नहीं - सन्त बाबा उमाकान्त महाराज

ऐसा दीप जलाओ, जो कभी बुझे ही नहीं - सन्त बाबा उमाकान्त महाराज
ऐसा दीप जलाओ, जो कभी बुझे ही नहीं - सन्त बाबा उमाकान्त महाराज

सुमिरन ध्यान भजन नियमित रुप से करोगे तो ऊपरी लोकों की अग्र, झिलमिल, शिखा आदि सब ज्योतियां दिखाई पड़ेंगी

ऐसा दीप जलाओ, जो कभी बुझे ही नहीं - सन्त बाबा उमाकान्त महाराज


नया भारत डेस्क : परमानेंट ज्योति जलाने वाले, दुनिया वाले जिन चीजों को पाने के लिए तमाम प्रयास दिन-रात करते रहते हैं उनकी आटोमेटिक सप्लाई शुरू करवाने वाले, पुरानी साधनाएं जहाँ ख़त्म होती हैं उसके आगे से अध्यात्मिक यात्रा शुरू करवाने वाले, इस समय के महापुरुष, पूरे समरथ सन्त सतगुरु, दुःखहर्ता, उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त महाराज ने अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि अष्टांग योग, हठयोग, प्राणायाम, कुंडलियों का भेदन में इनकी (देवी-देवताओं की) परछाई दिख जाती है। मनुष्य शरीर में पाखाने के मुकाम गुदा चक्र पर इनका वास है।

गणेश , इनकी पत्नी रिद्धि-सिद्धि भी वहीं पर उनकी सेवा करती रहती है। कई दल कमल पर यह बैठे हुए हैं। वहीं पर पूर्व दिशा में इंद्र और शची (इंद्रा की पत्नी) की भी परछाई पड़ती है, उनका भी दर्शन हो जाता है। वहीं पर उत्तर दिशा में कुबेर, दक्षिण दिशा में यमराज भी दिखाई पड़ जाते हैं। इन सब की परछाई अब भी मनुष्य के चक्र पर पड़ती रहती है। उनका स्थान है तो ऊपर में लेकिन उनकी परछाई यहां पड़ती रहती है। तो इस तरह से लोग पूजा करते हैं। जो चक्र का भेदन करता है उसे उनको जानने और देखने का मौका मिलता है। लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती है जो सन्तमत में ज्यादा महत्व नहीं रखती है। आपकी जो साधना है, वह आंखों के नीचे की है ही नहीं, वो तो आंखों के ऊपर की है।

आंखें मध्य पांखी चमके, पांखी मध्य द्वारा, ते द्वारे दूरबीन लगावे, उतरे भव जल पारा। यह जो दीपक चिराग जलाते हैं, यह जो ज्योति है, यह तो नीचे की है। उधर तो अग्र ज्योति, झिलमिल ज्योति, शिखा ज्योति उस तरफ तो ये ज्योतियां है। उस तरफ की ज्योति को जो देख लेता है कि सन्तों के घर रोज दिवाली। वहां हमेशा दीपक जलते रहते हैं। दीपक ही नहीं जलते बल्कि बहुत तरीके के रंग-बिरंगे प्रकाश भी होते रहते हैं। तो उस (साधक) को इसकी कोई जरूरत नहीं रह जाती है। समझो जैसे घर में दीपक जलाते जलाओगे तो थोड़ी ही दूर तक रोशनी रहेगी लेकिन अगर हैलोजन जला दो तो पूरा कमरा रोशनी से भर जाएगा। तो आंखों के ऊपर के लोक प्रकाशमय है।

वहां तो रोशनी की कोई जरूरत ही नहीं है। नहीं कछु चाहिए दिया घृत बाती, दिया और बाती की कोई जरूरत ही नहीं है, परम प्रकाश रूप दिन राती। दिन और रात प्रकाश ही प्रकाश रहता है। यहां तो दिन में रोशनी और रात में अँधेरा लेकिन वहां रोशनी ही रोशनी रहती है, वहां रात का तो कोई नामो-निशान ही नहीं है। यह मैं कोई अपने मन की बात कह रहा हूं ? नहीं, यह तो महात्माओं ने देखा तो लिख करके गए- बिना भूमि एक महल बना है, तामे ज्योति आपरी रे, अंधा देख-देख सुख पावे, बात बतावे सारी रे।

अचरज देखा भारी साधो, अचरज देखा भारी रे। बिना बजाए निस दिन बाजे, घंटा शंख नगाड़ी रे, बहरा सुन-सुन मस्त होत है, तन की सुध बिसारी रे। यह बातें गलत नहीं हो सकती है। यह किताबें यह धार्मिक ग्रंथ गलत नहीं हो सकते हैं। स्पेलिंग वर्तनी गलत हो जाए, अपने मन से कोई उसमें लिख दे, उसका टिका टिप्पणी कर दे, अर्थ भले ही गलत कर दे लेकिन जो उस समय की पुरानी किताबें हैं, और उन्होंने अपने हाथ से लिखा या वह मुंह जो बोले और उनके प्रेमियों ने लिख दिया, वह कभी भी गलत नहीं हो सकती है।

कहने का मतलब प्रेमियों यह है कि यह जो आपको सुमिरन, ध्यान, भजन का तरीका बताया गया है, अगर आप नियमित रूप से करोगे तो आपको यह सारी ज्योतियां वहां दिखेगी। यह रिद्धि-सिद्धि, कामधेनू, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी, विष्णु, गणेश जी आदि यह जितने भी भगवान है, ये जब देखेंगे कि हमारी आत्मा तो अभी यहीं है और इन (साधक) की आत्मा और ऊपर चली जा रही है, यह तो उस प्रभु की तरफ बढ़ते चले जा रहे हैं तो इनके अंदर तो वहां की पावर आ रही है तब अपने आप ही यह हर चीज की पूर्ति करते चले जाएंगे। यह अणुमा, महिमा, गरिमा, लघुमा आदि यह जो सिद्धियां है, ये अपने आप, अनइच्छित आवइ बरिआई।।

यह अपने आप आने लगती है। गोस्वामी जी महाराज ने कहा है - जिमि सरिता सागर महुं जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएं। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएं।। धार्मिक लोगों के पास ये अपने आप आती है। जैसे समुद्र को इच्छा नहीं रहती है की नदी आकर के हममें मिले लेकिन नदी अपने आप जाकर के उसमें मिल जाती है, ऐसे ही जो इच्छा किन्हीं मन माही, हरी प्रताप कछु दुर्लभ नहीं। बिना घी-बत्ती का अंतर में जलते दीपकों को देखना ही असली दिवाली है।

ऐसा दीपक जलाओ, जो बुझे ही नहीं

ऐसा दीपक जलाओ जो बुझे ही नहीं। जिसका दिया बाती कभी हटे ही नहीं, हमेशा रहे। यह दिया और बत्ती तो जलने पर सुबह हटा दोगे। अब कोई दिया ऐसी मिल जाए कि एक बार जला दो तो जलता ही रहे। तो ऐसा अंतर में जलाओ की परम प्रकाश रुप दिन-राती, हमेशा जलता रहे और जीवन प्रकाशमय हो जाए। प्रकाश का यह त्यौहार दीपावली कहलाता है। ऐसा दिया अंदर में जलाओ जिससे जीवन में प्रकाश ही प्रकाश रहे। तो वह रास्ता आपको मिल गया है।

आज बैठना और बताई गयी साधना करना, और आज गुरु से कुछ मांगना। गुरु अगर दया कर देंगे तो आज का दिन ऐसा है की जो लोग दुनिया वाले यह भौतिक कर्म करके पाना चाहते हैं, तमाम सामान इकट्ठा करेंगे, तमाम पूजा-पाठ करेंगे, वह फल की इच्छा करते हैं, वह फल आपको दो-चार घंटे की साधना में ही मिल सकता है, उससे ज्यादा फल मिल सकता है। क्योंकि आपको फल पाने का तरीका मालूम है। आपको उपाय मालूम है लक्ष्मी जी, गणेश जी, रिद्धि-सिद्धि, कुबेर को खुश करने का। तो उन लोगों से ज्यादा आपको मिल सकता है, अगर आप प्रयास करोगे तो। बोलो जयगुरुदेव।