प्रभु का सच्चा भजन करने के लिए गृहस्थ आश्रम बहुत अच्छा है




प्रभु का सच्चा भजन करने के लिए गृहस्थ आश्रम बहुत अच्छा है
मन को तो खुराक मिलता रहता है लेकिन आत्मा को खुराक जल्दी नहीं मिलता
उज्जैन (म.प्र.)। अपने सतसंग के द्वारा हर तरह का फायदा जीवों को दिलाने वाले, आत्मा को खुराक दिलाने वाले, सांसों की पूंजी का सदुपयोग कराने वाले, इस समय के पूरे समरथ सन्त सतगुरु, परम दयालु, त्रिकालदर्शी, दुःखहर्ता, उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त महाराज ने 24 अप्रैल 2023 प्रातः उज्जैन आश्रम में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि जब भी खबर मिले, आ जाना चाहिए। सतसंग से फायदा, हर तरह का लाभ होता है। लेकिन गृहस्थी भी नहीं छोड़ना चाहिए। प्रभु का सच्चा भजन करने के लिए गृहस्थाश्रम बहुत अच्छा है। गृहस्थ आश्रम में भजन अच्छा होता है। गृहस्थ आश्रम से निकल करके आदमी भजन नहीं कर सकता है। और आज का माहौल बहुत ही खराब है। गृहस्थाश्रम का तो फिर भी माहौल थोड़ा अच्छा है। गुरु महाराज भी कहा करते थे कि आओ, (सतसंग) सुनो और फिर चिड़िया की तरह से उड़ जाओ। उदाहरण देकर समझाते थे। किसी भी तरह से जीव के समझ में आ जाए और जो बताया जाए, वैसा करने लग जाए। जैसे घास चरते बछड़े में दूध पीने की इच्छा जागने पर भाग कर अपनी मां के पास पहुँच जाता है। दूध पी कर फिर अपना चरने धूमने लगता है। घास खाते हुए भी दूध (वैसा स्वाद, पौष्टिक तत्व) की जरुरत होती है। कभी देर होने पर मां खुद आवाज लगा देती है तो बछड़ा अगर ऊंघ भी रहा हो तो भी आवाज को सुन करके चल पड़ता है।
मन को खुराक मिलता रहता है लेकिन आत्मा को खुराक जल्दी नहीं मिलता
इसी तरह से आत्मा का खुराक अलग होता है। इसको भी देना जरूरी होता है। मन का खुराक तो समाज, घर, गांव में मिलता रहता है। वातावरण का असर मन पर पड़ता है। मन को खुराक तो मिलता रहता है लेकिन आत्मा को खुराक जल्दी नहीं मिलता है। इसीलिए आत्मा को खुराक देना जरूरी होता है। उसके लिए सतसंग में आना चाहिए। लेकिन आते-जाते रहना चाहिए, जमना नहीं चाहिए। बातों को याद रखना चाहिए।
दीर्घायु- का मतलब, की जरुरत क्यों, बनेंगे कैसे
बाबा उमाकान्त ने 3 अप्रैल 2023 सायं पेंड्री (दुर्ग) में बताया कि गिनती की मिली साँसों को अगर बचाया जाए तो कम खर्च होता है। कहते हैं बैठे 12 चले 18 सोवे से 36, रतिक्रिया से दूनी हो गई कह गए कवि जगदीश। सबसे ज्यादा साँसे भोग में खर्च होती हैं। तो इस तरह से बचाया जाता है ताकि हम दीर्घायु हो। दीर्घायु मतलब ज्यादा समय तक जिंदा रहे, मतलब योग साधना करने के लिए हमको समय चाहिए। पहले (के युगों) की पूजा उपासना बड़ी कठिन थी। अष्टांग योग, हठयोग, कुंडलियों को जगाना, प्राणों को खींचना-छोड़ना आदि में उम्र की ज्यादा जरूरत पड़ती थी। त्रेता में दस हजार वर्ष की द्वापर में हजार, कलयुग में सौ वर्ष की उम्र बताई गयी। उतना भी इस समय आदमी का जी पाना मुश्किल हो रहा है। कारण? संयम-नियम का पालन आदमी नहीं कर पाता है। बहुतों को तो इनकी जानकारी ही नहीं हो पाई क्योंकि उनको कोई जानकार मिलते नहीं, सतसंग सुनते नहीं हैं, जानकारी अगर हो भी जाती है तो उसका पालन नहीं कर पाते हैं तो शरीर कमजोर हो जाता है तब कोई काम के लायक नहीं रहता, किसी चीज में मन नहीं लगता। मन नहीं लगेगा तो भजन भाव भक्ति नहीं होगी और समय ऐसे ही बर्बाद हो जाता है, सांसो की पूंजी ऐसे ही खत्म हो जाती है, आदमी का जीवन बेकार हो जाता है।