आज़ाद भारत में अब भी वही पुरानी प्रथाएं पनप रही हैं, सामाजिक बहिष्कार जो देश के संविधान को चुनौती दे रहा है, लेकिन क्यों?
The same old practices are still flourishing in




NBL, 06/08/2023, Lokeshwer Prasad Verma, Raipur CG: The same old practices are still flourishing in independent India, social boycott which is challenging the constitution of the country, but why? पढ़े विस्तार से....
भारत में सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि जो राजनीतिक दल सामाजिक बहिष्कार की बात करते हैं, उनके नेताओं को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, भारतीय समाज के सामाजिक कानून और जो राजनीतिक दल समाज में बदलाव लाते हैं, उनका प्रभाव राजनीति और राजनीति में भी देखा जा सकता है। उनका वोट प्रतिशत गिर सकता है, इसलिए देश की कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसे ज्वलंत मुद्दे को सामने नहीं लाती जबकि भारत की प्रगति के लिए यह बहुत जरूरी है।
* सामाजिक बहिष्कार का पीड़ा: बेटियों ने दिया कांधा अंत्येष्टि मे शामिल हुए के 5 परिजन गाँव के सामाजिक व्यक्ति एक भी शामिल नहीं हुआ ये कैसा सामाजिक न्याय है इस पर देश के संविधान को अपनी संज्ञान में लेते हुए नया कानून संसोधन करनी चाहिए और देश के संसद और संविधान में इस सामाजिक बहिष्कार के विषय पर चर्चा होनी चाहिए। सामाजिक बहिष्कार से पीड़ित लोगों को पूरी सच्चाई जाने बिना ही उनको समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है, जो सही नहीं है, यह हमारे समाज के जनहित में सही है आप समाज मानते होंगे लेकिन समाज के प्रबुद्ध लोगों को सोचना होगा कि यह आपके समाज की न्याय प्रणाली सही है,क्या यह सभी मापदण्डों के आधार पर बिल्कुल सही एवं सत्य है? जो व्यक्ति अपनों के बीच पला-बढ़ा हो और उसके परिवार का कोई भी एक सदस्य गलती कर दे तो क्या उसे सामाजिक दंड देकर पूरे परिवार के सदस्यों को बहिष्कृत कर देना उचित है?
पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक तथा सामाजिक बहिष्कार करके उन्हें अपने ही समाज के लोगों से अलग-थलग करके उनके साथ अन्याय करके उनको मजबूर करना, क्या समाज में लगे प्रतिबंधों का अन्य और आपके समाज के लोगों पर कोई प्रभाव पड़ता है, मेरे विचार से, बिल्कुल नहीं और मेरे कहने का मुख्य बिंदु यह है कि समाज में सजा का मतलब क्या है?
जो आपके समाज के अमीर व्यक्ति पचास अपराध करने के बाद भी समाज में अपना सिर ऊंचा रखता है क्योंकि आप समाज को इस अमीर अपराधी अपनी अपराध को धोने के लिए आप समाज को अच्छी मोटी रकम दी है,जो आप समाज के लोगों ने आर्थिक दंड के रूप में लिया है, यानी आर्थिक दंड, जिसकी भरपाई यदि दोषी व्यक्ति ने आपके समाज को दे दिया तो क्या वे अपने पापों से मुक्त हो गए हैं।
क्या उनके सभी पाप धुल गए हैं, क्योंकि आप समाज निष्पक्ष न्याय नही कर रहे हैं, लेकिन आप समाज व्यवसाय कर रहे हैं, जिससे आप समाज के वार्षिक राशि जोड़कर आप समाज अपने ही समाज के लोगों को ब्याज में दे रहे हैं। तो आप समाज स्वयं रुपये के लालच में आकर अपराध कर रहे है और आप समाज अमीर व्यक्ति का अपराध माफ कर रहे है और आप समाज गरीब परिवार के लोगों का बहिष्कार कर रहे हैं, यह आपके समाज का कौन सा न्याय है?
भारत में लगातार सामाजिक बहिष्कार के मामले बढ़ते जा रहे हैं. सामाजिक बहिष्कार किए जाने के बाद उस व्यक्ति और परिवार का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता है. लगातार बढ़ते सामाजिक बहिष्कार की वजह से कई परिवार परेशान हैं. उन्हें शारीरिक मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. भारत में सामाजिक बहिष्कार के मामले को लेकर कोई कानून नहीं बनाया गया है. जिसकी वजह से इन मामलों में शासन प्रशासन के लोग मूकदर्शक बने रहते हैं। जबकि यह समाजिक न्याय प्रक्रिया देश के आजादी के पहले था जब देश में कोई संविधान कानून नही था और छुआ छूत उच्च निच जाति के आधार पर ये सब अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए सामाजिक न्याय बना हुआ था जो कुछ हद तक ठीक था लेकिन बेहतर नही यह सामाजिक न्याय रूढ़िवादी न्याय है जो इस पर देश में नया कानून संसोधन होना चाहिए।
सामाजिक बहिष्कार व्यक्तिगत पसंद, फैशन, जीवन स्तर, शैक्षिक स्थिति और सामाजिक समानता से भी जुड़ा हुआ है। सामाजिक बहिष्कार के कारण पीड़ित परिवार अपनी क्षमता, कौशल और योग्यता का पूरा उपयोग नहीं कर पाता, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी क्षमता नहीं दिखा पाता। सामाजिक बहिष्कार की प्रक्रिया के माध्यम से उसकी क्षमता, योग्यता और कौशल को लगातार दबाने का प्रयास किया जाता है।
सामाजिक बहिष्कार के दुष्परिणाम :-
* समाज का एक वर्ग गरीबी की ओर जाता है।
* उपलब्ध संसाधनों के उपयोग को रोकता है।
* यह मानव जीवन को दरिद्रता की ओर ले जाता है।
* यह समाज में भेदभाव और हिंसा को बढ़ावा देता है।
* सामाजिक दो तरफा और वैचारिक संघर्षों को बढ़ावा देता है।
* मौलिक अधिकारों के प्रयोग और अस्तित्व में संकट पैदा करता है।
* समाज में अमन-चैन की जगह भय का वातावरण निर्मित हो जाता है।
* आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक विविधता को बढ़ावा देता है।
* यह समाज में असमानता, गरीबी, बेरोजगारी और अनैच्छिक प्रयास को बढ़ाता है।
* समाज से बहिष्कृत लोगों की स्वतंत्रता और सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक गतिविधियों में पूर्व भागीदारी से बाहर रखा जाता है।
समाज में सामाजिक बहिष्कार के विभिन्न रूप विद्यमान हैं, इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। सामाजिक अपवर्जन जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र, आयु, नर आदि के आधार पर किया जाता है। इस सामाजिक अपवर्जन के कारण उपेक्षित लोग अपनी क्षमता और क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते हैं। वे एक समतामूलक समाज का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं। वे समानता और स्वतंत्रता के आधार पर अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने में सक्षम नहीं हैं।
कानून बनाने के लाभ: पूरे भारत में हजारों परिवार छोटे-छोटे कारणों से समाज से बहिष्कृत कर दिये गये। पीढ़ियां बदल गईं लेकिन परिवार पर लगा प्रतिबंध नहीं हटा. अगर भारत के हर राज्य में सामाजिक बहिष्कार को लेकर कानून बन जाए तो आने वाले समय में ऐसे मामलों में कमी आएगी. साथ ही ऐसे लोगों को कानूनी मदद मिलेगी जो सामाजिक बुराई का दंश झेल रहे हैं।