मार्कण्डेय पुराण में माँ चंद्रघंटा का वर्णन एक साहसी और शक्तिशाली देवी के रूप में किया गया है, आइए जानते है डॉ सुमित्रा अग्रवाल से...




माँ चंद्रघंटा
डॉ सुमित्रा अग्रवाल
सेलिब्रिटी वास्तु शास्त्री
यूट्यूब वास्तु सुमित्रा
कोलकाता : मार्कण्डेय पुराण में माँ चंद्रघंटा का वर्णन एक साहसी और शक्तिशाली देवी के रूप में किया गया है। उनके इस रूप में देवी का स्वरूप शांतिपूर्ण होते हुए भी युद्ध के लिए तत्पर दिखता है।
इस पुराण में माँ चंद्रघंटा के रूप को देवी पार्वती का एक रूप बताया गया है, जब उन्होंने महिषासुर के आतंक से देवताओं की रक्षा करने के लिए इस अद्भुत रूप को धारण किया। उनके घंटे के स्वर से शत्रु भयभीत हो जाते हैं और उनकी शक्तिशाली दहाड़ से महिषासुर जैसे राक्षसों का नाश होता है।
दुर्गा सप्तशती में भी माँ चंद्रघंटा का उल्लेख होता है। यह ग्रंथ देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों की महिमा का बखान करता है, जिनमें माँ चंद्रघंटा का तेजस्वी और वीरतापूर्ण रूप विशेष रूप से वर्णित है।
दुर्गा सप्तशती में माँ चंद्रघंटा को युद्ध की देवी के रूप में देखा जाता है, जो अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके शत्रुओं का नाश करती हैं। उनकी पूजा से साहस, आत्मबल, और नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा प्राप्त होती है।
माँ चंद्रघंटा की विशेषताएँ :
माँ चंद्रघंटा अष्टभुजा धारण करती हैं, जिनमें वे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रहती हैं। उनके हाथों में कमल, त्रिशूल, गदा, तलवार, और अन्य शस्त्र होते हैं।
उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र होता है, जो उनकी शक्ति और सौम्यता का प्रतीक है।
उनका वाहन सिंह है, जो साहस और शक्ति का प्रतीक है। माँ चंद्रघंटा युद्ध के लिए सदा तैयार रहती हैं, लेकिन उनके मुख पर सौम्यता और शांति का भाव भी होता है, जो बताता है कि वे संकटों से लड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन स्वभाव से दयालु हैं।
माँ चंद्रघंटा की पूजा का महत्व :
माँ चंद्रघंटा की पूजा से भय और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। वे अपने भक्तों को साहस, वीरता और आत्मविश्वास का आशीर्वाद देती हैं।
उनकी पूजा से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से व्यक्ति को अदम्य साहस और शक्ति प्राप्त होती है, जिससे वह जीवन की कठिनाइयों का सामना कर सकता है।
उनकी पूजा विशेष रूप से शत्रुओं से रक्षा, शांति और समृद्धि के लिए की जाती है।