उदासीनाचार्य भगवान श्री श्रीचंद्र जी महाराज का 527वां प्राकट्योत्सव बुधवार को




भीलवाड़ा। हरी शेवा धाम, उदासीन आश्रम सनातन मंदिर भीलवाड़ा में उदासीन संप्रदाय के आचार्य श्री श्रीचंद्र जी महाराज का 527वां प्राकट्योत्सव 15 सितंबर 2021 बुधवार को बड़े हर्षोल्लास एवं उमंग के साथ मनाया जाएगा। महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी उदासीन ने बताया कि सदैव की भांति देश-विदेश के आश्रमों,अखाड़ों, धर्मस्थलों में संतों-महापुरुषों, अनुयायियों, आमजन द्वारा उदासीन आचार्य श्री श्रीचंद्र जी महाराज का प्राकट्योत्सव मनाया जाएगा। सनातन परंपरा में भाद्रपद शुक्ल नवमी को श्रीचंद्र नवमी के रूप में मनाया जाता है। संत मयाराम ने बताया कि श्रीचंद्र नवमी बुधवार को प्रातः गणेश पूजन के बाद श्री श्रीचंद्र जी महाराज का दुग्धाभिषेक होगा। तत्पश्चात आरती होगी। सायंकाल में संतों महापुरुषों के सत्संग प्रवचन होंगे। श्री मात्रा साहब, वाणी पाठ, धूनी, सुमिरन, प्रार्थना एवं महाआरती होगी। इस अवसर पर स्वामी त्र्यंबकेश्वर चैतन्य जी महाराज एवं संत मंडली द्वारा भी श्रीचंद्र जी महाराज के जीवन लीलाओं पर विशेष उदबोधन दिया जाएगा। परम तपस्वी उदासीन आचार्य श्री श्रीचंद्र जी महाराज का जन्म भाद्रपद शुक्ल नवमी संवत 1551 (सन् 1494) में तलवंडी ननकाना साहब में हुआ। जन्म से ही जटाएं एवं उनके शरीर पर विभूति की एक पतली परत, दाहिने कान में मांस का एक कुंडल था। कालान्तर में उन्होंने गुरु अविनाश मुनि से दीक्षा ली। उदासीनाचार्य गहन वन में एकांत में समाधि लगा कर बैठ जाते थे। हर सुख-दुख को साक्षी भाव से देखते थे। उनका मानना था कि उदासीन भाव रखने से मन को कष्ट नहीं होता है। चित्तौड़गढ़ के महाराणा प्रताप को सन् 1576 में उदासीन आचार्य श्री श्रीचंद्र जी महाराज का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 149 वर्ष की आयु में रावी नदी के किनारे शीला पर सवार होकर कैलाश की ओर लुप्त हो गए। उदासीन आचार्य श्री श्रीचंद्र जी महाराज के परम शिष्य में गोविंद देव, अलमस्त साहब, बालदास, पुष्पेंद्र थे। उदासीन संप्रदाय अनादि से है। कालान्तर में उदासीन आचार्य श्री श्रीचंद्र जी महाराज ने विलुप्त होते संप्रदाय को गगनचुंबी ऊंचाइयों पर पहुंचाया।