सन्त बाबा उमाकान्त महाराज ने बताया कर्मों के अनुसार अंत समय पर जीव के साथ कैसा व्यवहार होता है...




सन्त बाबा उमाकान्त महाराज ने बताया कर्मों के अनुसार अंत समय पर जीव के साथ कैसा व्यवहार होता है
सपने में क्या होता है, क्यों, कैसे, कब आते हैं
बावल (हरियाणा) : सर्वज्ञाता, यमदूतों के चक्कर से छुड़ाने वाले, जान-माल के रक्षक, इस समय के युगपुरुष, पूरे समरथ सन्त सतगुरु, दुःखहर्ता, उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त महाराज ने बताया कि सबकी मृत्यु एक जैसी नहीं होती है। कोई आराम से चला जाता है। किसी का आंख, मुंह खुला रहता है। जो सन्त होते हैं, आराम से निकल जाते हैं। साधक सिद्ध के प्राण सुष्मना फोड करके निकलते हैं। धार्मिक व्यक्ति के उनके आंख, मुंह, कान से निकलते हैं। पापी कुकर्मी के प्राण यमराज के दूत मार-मार कर निकलते हैं। उनकी जीवात्मा लैट्रिन-पेशाब के रास्ते से निकालती है। जब उनको देखता है तब जीव घबराता, रोता, चिल्लाता है। उनका भयंकर रूप, लंबी टेढ़ी नाक, बड़े-बड़े बाल, कुरूपी चेहरा जब देखता है तो तब घबरा जाता है। पापी कुकर्मी जीव जब उनकी आवाज को सुनता है तो मालूम पड़ता है जैसे सैकड़ों पहाड़ एक साथ टूट रहे हो। हड्डी-हड्डी उस वक्त चटकने लगती है। आंख की रोशनी खत्म हो जाती है। कान से सुनाई नहीं पड़ता है । तभी तो काका, चाचा, नाना, मामा सभी को पुकारता है, मुसीबत में कोई भी बचा ले। लेकिन कोई बचा सकता है? कोई नहीं बचा सकता है। वही बच्चे, परिवार, हित, मित्र जिनके लिए मरता रहा, शरीर से पाप करता रहा, वो सब, जाति बिरादरी समाज के लोग सब खड़े रहते हैं लेकिन कोई मदद नहीं कर सकता। दिखेंगे ही नहीं तो कोई क्या मदद कर पायेगा। लिंग शरीर में होने की वजह से यमराज के दूत को इस पंच भौतिक शरीर के चर्म चक्षु से नहीं देख सकते हो। तो मार कूटकर निकाल कर के पिशाच के शरीर में बंद करके यमराज के सामने ले जाते हैं। उसके पास पूरा लेखा-जोखा होता है । बचपन से लेकर आखरी वक्त तक जो भी कर्म होते हैं उसके पास सब लिखे हुए होते हैं। यह लोगों का भूल-भ्रम है कि मैं जो कर रहा हूं, उसको कोई देख नहीं रहा है। कहते हैं आंख बचाकर के कर लो, लेकिन जो कुछ भी कर रहे हो, उसको वह देख रहा है, जिसको आप नहीं देख पा रहे हो। वह आप का किया कराया, अच्छा-बुरा सब देख रहा है। तो नोट होता रहता है। बस उसी के आधार पर सजा बोल देते हैं। बड़े-बड़े बही खाता, कंप्यूटर फेल, स्याही खत्म, पेन खराब, कागज़ गल सकता है लेकिन उसके काम का कुछ नहीं बिगड़ता, उसका कागज़ नहीं सड़ता है।
चित्रगुप्त के बही खाते कैसे होते हैं
सुनहरे पन्ने जैसे कागज होते हैं। एकदम मोटे और कोई भी लिखावट इधर लिख दो तो दूसरी तरफ नहीं दिखाई पड़ती है। देखने में मोटा होता है लेकिन रहता पतला कागज है। अब उसमें सारी लेखनी लिखी रहती है। जो भी होता है उसको चित्रगुप्त उसको पलटते रहते हैं। चित्रगुप्त की छाया गुदा चक्र पर पड़ती है। चक्रों का भेदन जो लोग करते हैं, उन पर दिखाई पड़ते है। वहां कुछ दल कमल पर गणेश जी, रिद्धि सिद्धि का स्थान बताया गया है। उसमें उत्तर की तरफ कमल की पंखुड़ी है, उस पर उनकी छाया पड़ती है। तो उनके पास पूरा रिकॉर्ड होता है। तो उसी को देख कर के फौरन यमराज को बता देते हैं। यमराज तुरंत सजा दे देता है और सजा बोलते ही मार पड़ना शुरू हो जाती है। सौ-सौ कोस तक आवाज जाती है लेकिन कोई मददगार नहीं होता। आगे भी बहुत डिटेल में महाराज जी ने पूरा बताया और चेताया कि अपने आत्मा के कल्याण में लगो।
सपने में क्या होता है
जीवात्मा जब लिंग शरीर में जाती है, तब शरीर का होश रहता है। सुक्ष्म शरीर में थोड़ा रहता है, कारण में फिर जाकर भूलता है। जब जीवात्मा शब्द को पकड़ लेती है तो बिल्कुल भूल जाती है। सपने में क्या होता है? सपने में इस शरीर से जीवात्मा निकलकर के लिंग शरीर के अक्स में जाकर पहुंच जाती है। अक्स यानी छाया, जैसे इन देवताओं की छाया शरीर के कमलों के ऊपर पड़ती रहती है। गुदा चक्र पर गणेश जी, रिद्धि-सिद्धि की छाया पड़ती है। वहीं पर कुबेर, इंद्र की भी छाया पड़ती है। इन कमलों पर अलग-अलग इनकी छाया पड़ती रहती है। पूर्व की तरफ देवताओं के राजा इंद्र और उनकी पत्नी शचि की छाया पड़ती है। उत्तर की तरफ कुबेर, दक्षिण की तरफ यमराज, चित्रगुप्त की छाया पड़ती है। इस तरह से छाया पड़ती है और दिखाई पड़ती है। देवता यहां रहते नहीं है, लेकिन उनकी छाया सब पर पड़ती रहती है। आप उस सिस्टम को देखोगे कि जिस सिस्टम से शरीर चल रहा है और बनाया जा रहा है तो आप आश्चर्य करोगे कि कैसे किस तरह से इस सिस्टम को बनाया। कबीर साहब ने कहा है झीनी रे चदरिया, जैसे चद्दर मे सुराख है इस तरह से बना दिया गया है। जीवात्मा आज्ञा चक्र पर बैठी हुई है। तो उस समय (सोते समय) पर जीवात्मा मन कंठ चक्र पर आती है तो आदमी को हल्का-हल्का होश रहता है, अर्ध निंद्रा जिसको कहते हैं। जब एकदम कहते हैं, घोड़ा बेचकर सोया है, गहरी नींद में जब सोते हैं तब सपने नहीं आते हैं। हल्की नींद में सपने आते हैं। तो यह जीवात्मा रचना कर डालती है और मन उसी पर चक्कर लगाता रहता है। मन और आत्मा का साथ जब तक कारण शरीर में नहीं छूटता है, मन अपने भडार में जब तक नहीं समाता है, तब तक (साथ) रहता है। जब तक शरीर रहता है तब तक मन शरीर के साथ रहता है। जैसे एक सिक्के के दो पहलू रहते हैं, इस तरह से हो जाता है। मन जीवात्मा का साथ नहीं छोड़ता है। लेकिन मन का काम क्या है चलना? हमेशा चलता रहेगा, अंदर भी, बाहर भी। लेकिन जीवात्मा स्थिर हो जाती है। वहां पर कई दल कमल है। वहा आद्या महा शक्ति का स्थान बताया गया। तो दलों पर यह ऐसे घूमता रहता है। कहा गया है- देखो सपने अनेक प्रकार। एक तरह का सपना नहीं आता है। बहुत तरीके के सपने आते हैं। कुछ पिछले जन्मों की याद आ जाते हैं। कुछ अपने पीछे किए हुए कर्मों के आ जाते हैं। और कुछ जैसे दिन में आदमी करता है, वह आ जाते हैं । तो सपने इसलिए सिस्टमैटिक नहीं होते हैं, उटपटांग होते हैं। कभी कुछ दिखता है, कभी ऐसे, कभी वैसे हो जाता है। तो लिंग शरीर की अक्स जब पड़ती है, तब तक अर्ध निद्रा रहती है। और जब कारण शरीर पर पड़ने लगती है तब एकदम सुप्त अवस्था में सो जाता है आदमी। और कारण शरीर से ऊपर जब निकल गया तो इस शरीर का संबंध खत्म हो जाता है। और साधना में भी ऐसे होता है और सिमटाव आखिरी वक्त पर भी ऐसे ही होता है।